बीकानेर का रोमांचक रातीघाटी युद्ध – गुलाब बत्रा

बीकानेर का रोमांचक रातीघाटी युद्ध – गुलाब बत्रा
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सोलहवीं शताब्दी में उत्तर भारत में लगभग एक दशक की अवधि में लड़े गए तीन युद्धों में एक युद्ध भारतीय परम्परा के विपरीत रात्रि में लड़ा गया। बीकानेर के शासक राव जैतसी ने अनूठी रणनीति से शनिवार 26 अक्टूबर 1534 को रातीघाटी युद्ध में तोपखाने और भारी भरकम सेना से हमला करने आये बाबर के पुत्र कामरान को अपनी जान बचा कर भागने को विवश कर दिया।
रोमांचक रातीघाटी युद्ध की कहानी 21 अप्रैल 1526 को पानीपत के मैदान में लड़े गए प्रथम युद्ध और 16 मार्च 1527 को खानवा के युद्ध में बाबर से जुड़ी हुई है। विदेशी आक्रान्ताओं के भारत पर हमलों की श्रृंखला में बाबर ने पानीपत में पहली बार तोपखाना एवं बारूद सहित सैन्य सामग्री के बलबूते दिल्ली सल्तनत के सुल्तान इब्राहिम लोदी को परास्त किया। लोदी वंश शासन के खात्मे के पश्चात बाबर ने उत्तर भारत में अपना प्रभुत्व कायम करने की रणनीति अपनायी।
अपने सैन्य अभियान को बढ़ाते हुए बाबर ने प्रारम्भिक सफलता हासिल की। बाबर के साम्राज्य विस्तार में सबसे बड़ी बाधा मेवाड़ के महाराणा संग्राम सिंह उपाख्य राणा सांगा की ताकत और युद्ध रणनीति का करिश्मा था। बाबर से पहले राणा सांगा इब्राहिम लोदी को पराजित कर दिल्ली सल्तनत को दहला चुका था। राणा सांगा और बाबर को आमने-सामने के संभावित युद्ध का एहसास था जिसकी तिथि निकट थी। दोनों पक्षों से इस दिशा में प्रयास आरम्भ हो गए।
सामरिक दृष्टि से उत्तर भारत में अत्यंत महत्वपूर्ण भरतपुर जिले के बयाना दुर्ग पर बाबर का आधिपत्य समाप्त कर राणा सांगा ने भारत भूमि की रक्षार्थ मारवाड़, आमेर, मेवाड़, बीकानेर, ग्वालियर इत्यादि रियासतों की सैन्य शक्ति को संगठित कर खानवा की युद्ध स्थली पर मोर्चा जमाया। वर्ष 1527 की 16 मार्च को लड़े गए भीषण युद्ध में शत्रु सेना की तोपों की गर्जना पर अंकुश लगाने के बावजूद एक तीर से राणा सांगा के घायल होने तथा हाथी के हौदे से युद्ध का पासा पलट गया।
खानवा युद्ध में बाबर की सेना के एक प्रमुख सेनापति और पुत्र कामरान तथा बीकानेर की तीन हजार सेना के मुखिया राव जैतसी के पुत्र युवराज कल्याणमल का आमना सामना हुआ। करीब आठ वर्ष पश्चात दोनों योद्धाओं का बीकानेर रियासत में पुनः मुकाबला हुआ।
बाबर की मौत के पश्चात उसका पुत्र हुमायूं दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर था, वहीं गजनी एवं लाहौर का सुल्तान दूसरा पुत्र कामरान अपने इलाके के विस्तार की पटकथा लिख रहा था। बीकानेर रियासत की सीमा उसकी सल्तनत से टकराने लगी थी। विस्तार के मंसूबे के मकसद से उसकी नज़र भटनेर दुर्ग पर आधिपत्य की थी। तब वह हुमायूँ के कब्जे में था। लेकिन 1530 में कांधलोत खेतसी ने भी रात्रि में हमला कर भटनेर दुर्ग पर आधिपत्य जमा लिया। भटनेर विदेशी आक्रान्ताओं के लिए भारत का प्रवेश द्वार माना जाता था।
बाबर की 1530 में मौत के पश्चात भारत में हुमायूं उसका उत्तराधिकारी बना। अपने भाई की गद्दी हथियाने की गरज से कामरान ने थार मरुस्थल के राज्यों को अपने आधिपत्य में लेने से पहले भटनेर दुर्ग जीतने की रणनीति अपनाई। वर्तमान हनुमानगढ़ का भटनेर रणनीतिक दृष्टि से उत्तर पश्चिमी सीमा का रक्षक दुर्ग था। यह कभी लुप्त सरस्वती नदी का प्रमुख नगर था।
कामरान ने पूरी तैयारी के साथ भटनेर दुर्ग जीतने का अभियान आरम्भ किया। भटनेर की घेराबंदी करते हुए कामरान ने दुर्ग स्वामी कांधलोत खेतसी को अपनी शरण में आने की धमकी दी। वीर खेतसी ने युद्ध की चुनौती स्वीकार की। कामरान की लगभग बीस हजार सेना ने तोपों के गोलों तथा तीरों की मार से दुर्ग को तहस नहस किया। दुर्ग में मौजूद स्त्रियों तथा योद्धाओं ने केसरिया धारण कर साका किया।
राव जैतसी ने भावी युद्ध में मुकाबले के लिए विभिन्न योजनाओं की रूपरेखा बनाई। समूचे राजपूताना, अमरकोट सिंध, मालवा – मध्यप्रदेश, गुजरात तथा मुल्तान इलाके के शूरवीरों को युद्ध आमंत्रण देकर युद्ध परिषद की बैठकों में युद्ध रणनीति पर चर्चा की। क्षेत्रवार सेनापति तथा संबंधित कार्य योजना को अंतिम रूप दिया गया। लेकिन रातीघाटी युद्ध की विशिष्ट रणनीति को गोपनीय रखते हुए बीकानेर के चतुर्थ शासक राव जैतसी ने रियासत की प्रजा को सुरक्षित स्थानों पर भेजकर अन्य संबंधित व्यवस्थाओं को चाक-चौबंद किया। दुर्ग की रक्षा का भार सेनापति भोजराज रूपावत सहित अन्य भारी योद्धाओं को सौंपा गया। रणनीति के तहत राव जैतसी कुछ सैनिकों के साथ अन्तर्ध्यान हो गए। लेकिन उनका पूरा ध्यान शत्रु सेना पर था।
भटनेर दुर्ग जीतने के पश्चात कामरान ने बीकानेर की ओर प्रयाण किया। खेजड़ी वृक्षों के फैलाव वाले इलाके में दो माह पहले सैन्य शिविर के साथ बीकानेर के ऊंचाई वाले टीले पर बनाये गये सोभागरीप दुर्ग (वर्तमान में लक्ष्मीनाथजी का मंदिर) का घेरा डाल दिया। सेनापति आलम बेग से राव जैतसी को यह संदेश भिजवाया कि वह हथियार डालते हुए दस करोड़ रुपये हर्जाना देने के साथ राजकन्या का विवाह सुल्तान से करने को राजी हो जाए।
राव जैतसी ने इस संदेश का उत्तर मनोवैज्ञानिक रणनीति के अनुरूप दिया। आलम बेग को नगर के सँकरे संकीर्ण मार्ग तथा बाजार से होते हुए युद्ध संबंधी तैयारियों व दुर्ग के एक प्रवेश द्वार से लाया गया ताकि वह युद्ध संबंधी तैयारियों की झलक पा सके। सेनापति को दूसरे द्वार से दुर्ग के बाहर भेजा गया। शत्रु सेना को फंसाने में यह तरकीब काम कर गई। भौचक्की शत्रु सेना ने इसी मार्ग से हमला किया लेकिन सँकरे रास्तों तथा बाज़ार में छिपे राव जैतसी के सैनिकों के मुकाबले से कामरान की सेना हक्की बक्की रह गई।
मिगसर कृष्णा चतुर्थ संवत 1591 अर्थात 26 अक्टूबर 1534 को दिन भर हुए भीषण युद्ध में कामरान की सेना ने लाल चिकनी माटी पर बने सोभागरीप दुर्ग पर कब्जा कर लिया। लेकिन शत्रु सेना को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी। इस युद्ध का नया अध्याय अभी लिखा जाना था।
विजयी कामरान का दुर्ग पर आने का मंसूबा पूरा होता, इससे पहले रात्रि में मशालों की चमक देख शत्रु सेना में हड़कम्प मच गया। दरअसल राव जैतसी की गुप्त युद्ध नीति के अनुरूप सैकड़ों पशुओं के दोनों सींगों पर जलती मशालें तथा ऊंटों के पलाणों पर युद्ध के नगाड़े सहित तीन-तीन मशालें बंधवा कर युद्ध स्थल पर इस तरह हकवाया गया कि शत्रु सेना भयभीत हो जाए। ऐसे चमत्कारी युद्ध परिदृश्य का क्लाइमेक्स तो तब आया जब राव जैतसी की सैन्य टोली ने कामरान के शिविर पर सीधा हमला बोल दिया।
कामरान के रक्षक सैनिकों के तो हाथ-पाँव फूल गये और भीषण संग्राम में वे टिक नहीं पाये। अफरातफरी के इस माहौल में राव जैतसी ने रैवतपसाव अश्व से कामरान को सीधे दो-दो हाथ करने को ललकारा। अपने एक सेनापति आफ़ताब और कुछ सैनिकों की मदद से कामरान ने युद्ध की अपेक्षा शिविर से भागना मुनासिब समझा।
भयातुर कामरान का शिरस्त्राण धोहाड़ियां गांव में गिर गया लेकिन उसे उठाने की हिम्मत नहीं हुई। बाद में यह गाँव देशनोक की युद्ध मैदान से अपनी जान बचाकर भाग छूटे कामरान ने लाहौर जाकर दम लिया। वापसी के मार्ग में कामरान क्षेत्र की जनता पर अत्याचार नहीं करे इसलिए राव जैतसी के अश्वारोही दल ने उनका बराबर पीछा किया।
शत्रु सेना की पराजय के पश्चात सूर्योदय होते ही राव जैतसी सोभागरीप दुर्ग पहुंचे। उन्होंने कामरान सेना द्वारा युवतियों तथा गायों के बंधन खुलवाये। श्री लक्ष्मीनाथ मंदिर में दर्शन किए और शत्रु सेना के दिवंगत सैनिकों के अंतिम संस्कार के निर्देश देकर राव जैतसी ने उच्च भारतीय परम्परा का निर्वाह किया।
तोपखाने, अधुनातन शस्त्रों एवं संख्या बल की दृष्टि से भारी शत्रु सेना के मुकाबले राव जैतसी ने नागौर तथा जैसलमेर के अनुभव से रात्रि युद्ध का विकल्प चुना। विदेशी आक्रान्ताओं से भारत की पश्चिमी सीमा की रक्षार्थ संयुक्त सैन्य अभियान के प्रतीक रातीघाटी युद्ध में विभिन्न दिशाओं के अनुरूप सेना को 104 भागों में विभक्त कर सेनानायकों को दायित्व सौंपे गए। इस युद्ध में 6 पीढ़ी के योद्धाओं ने हिस्सा लिया। इसमें जोधपुर के संस्थापक राव जोधाजी के पुत्र 95 वर्षीय अमरसिंह एवं 13 वर्षीय जयमल मेड़तिया भी शामिल थे। शत्रुओं के लिए अप्रत्याशित व्यूह रचना से राव जैतसी ने सर्वस्व दांव पर लगाकर अर्द्धरात्रि में प्रत्याक्रमण कर हारी हुई बाजी को भी स्वर्णिम जीत में बदल दिया।
बीकानेर के शिक्षाविद इतिहासकार जानकी नारायण श्रीमाली ने लगभग चार दशक की शोधयात्रा से 2021 में ऐतिहासिक उपन्यास “रातीघाटी युद्ध” का प्रणयन किया। इसके अनुसार रातीघाटी युद्ध में राव जैतसी की विजय को मुंशी देवी प्रसाद ‘सोलहवीं सदी में राजस्थान’ (पृष्ठ 144-45) डा. गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने बीकानेर का इतिहास (पृष्ठ 129-32) मुहणोत नैणसी की ख्यात के-।। पेज 193 तथा श्यामदास वीर विनोद भाग ।। पेज 483 पर उल्लेखित किया है। इस युद्ध में 1527 में ऐतिहासिक खानवा युद्ध के अनुभवी योद्धा भी सम्मिलित थे। राव जैतसी की विजय ने भारतीय प्रतिरोध के इतिहास का स्वर्णिम अध्याय लिख दिया।

गुलाब बत्रा, पूर्व समाचार संपादक यूनीवार्ता

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