चंडीगढ़, 10 अगस्त । सत्संग में आकर केवल आध्यात्मिक विचारों को सुनना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनसे प्राप्त भक्ति की पूंजी को अपने जीवन और व्यवहार में उतारना ही वास्तविक आध्यात्मिक उपलब्धि है। उन्होंने कहा कि प्रभु सिमरन, मानव सेवा, सत्संग और विनम्रता के माध्यम से मनुष्य अपने जीवन को निरंकार परमात्मा के साथ इकमिक कर सकता है, ये उद्गार यहां संत निरंकारी सत्संग भवन, सेक्टर-30, चंडीगढ़ में आयोजित विशाल सत्संग में संत निरंकारी मंडल, दिल्ली के केंद्रीय ज्ञान प्रचारक इन्द्रजीत शर्मा ने हजारों श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए व्यक्त किए ।
मानव जीवन के उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए शर्मा जी ने कहा कि मनुष्य इस संसार में केवल भौतिक उपलब्धियों के लिए नहीं आया, बल्कि परमात्मा की पहचान और मुक्ति की ओर बढ़ने के लिए आया है। भगवान महावीर के विचारों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि मुक्ति गुरु की शरण में प्राप्त होती है। उन्होंने आवश्यकता और इच्छा में अंतर समझाते हुए कहा कि आवश्यकता पूरी हो जाने के बाद भी इच्छाएं समाप्त नहीं होतीं। इच्छा एक ऐसी अग्नि है जिसे संसार की सारी संपत्ति भी शांत नहीं कर सकती। इसलिए मनुष्य को अनावश्यक इच्छाओं से मुक्त होकर संतोष और समर्पण का भाव विकसित करना चाहिए तथा सत्संग, सेवा और सिमरन का मार्ग अपनाना चाहिए।
सत्संग के महत्व को समझाते हुए उन्होंने बाबा गुरबचन सिंह के एक दृष्टांत का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार कपड़े की मैल निकल जाने के बाद उसमें बचे साबुन को निकालना भी आवश्यक होता है, अन्यथा साबुन कपड़े को खराब कर देता है, उसी प्रकार सत्संग से मन की मैल दूर होने के पश्चात उसके भीतर छिपे अहंकार को भी समाप्त करना आवश्यक है। सत्संग से नम्रता, धैर्य, सहनशीलता, करुणा, स्नेह और प्रेम जैसे दैवी गुण प्राप्त होते हैं, लेकिन इन गुणों का भी कभी अहंकार नहीं होना चाहिए।
शर्मा ने कहा कि मनुष्य को अपने जीवन में ऐसी विनम्रता और सहनशीलता विकसित करनी चाहिए, जैसी रास्ते के रोड़े और धरती में होती है। उन्होंने कहा कि आध्यात्मिकता का वास्तविक अर्थ अपने विचारों में सकारात्मक परिवर्तन लाना है, ताकि मनुष्य दूसरों के प्रति प्रेम, सम्मान और सहनशीलता का व्यवहार कर सके। उन्होंने कहा कि केवल बाहरी रूप से अच्छा दिखाई देना पर्याप्त नहीं, बल्कि मन और विचारों में भी विनम्रता का भाव होना चाहिए।
शर्मा ने सिमरन को आध्यात्मिक जीवन का आधार बताते हुए कहा कि सिमरन केवल शब्दों का दोहराव नहीं, बल्कि निरंतर अभ्यास के माध्यम से मन को परमात्मा में टिकाने की प्रक्रिया है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार एक छोटा बच्चा बार-बार प्रयास और अभ्यास करके चलना सीखता है और आगे चलकर सहज रूप से दौड़ने लगता है, उसी प्रकार निरंतर सिमरन के अभ्यास से मन भी धीरे-धीरे स्थिर और एकाग्र होने लगता है। उन्होंने श्रद्धालुओं से नियमित रूप से सिमरन करने का आह्वान किया।
उन्होंने समझाया कि जिस प्रकार व्यक्ति अपने दैनिक कार्य करते हुए भी अपना ध्यान अपने कार्य पर बनाए रखता है, उसी प्रकार गृहस्थ जीवन की सभी जिम्मेदारियां निभाते हुए मनुष्य का ध्यान निरंकार परमात्मा से जुड़ा रह सकता है। उन्होंने कहा कि संसार में रहते हुए कारोबार, परिवार और सामाजिक दायित्व निभाना आवश्यक है, लेकिन अपने वास्तविक आध्यात्मिक लक्ष्य को कभी नहीं भूलना चाहिए। गृहस्थ जीवन आध्यात्मिक मार्ग में बाधा नहीं, बल्कि जिम्मेदारियों को निभाते हुए भक्ति करने का अवसर है।
उन्होंने कहा कि ध्यान और सिमरन के माध्यम से मन को निरंकार में टिकाने का निरंतर प्रयास करते रहना चाहिए। सतगुरु के प्रति श्रद्धा और समर्पण को आध्यात्मिक जीवन का महत्वपूर्ण आधार बताते हुए उन्होंने कहा कि समय का सतगुरु मनुष्य को बाहरी आडंबरों से ऊपर उठाकर उसके भीतर परमात्मा की अनुभूति करवाने का मार्ग प्रशस्त करता है । उन्होंने कहा कि ज्ञान को जीवन में स्थिर करने के लिए ध्यान आवश्यक है और ध्यान के माध्यम से मन को एकाग्रता प्राप्त होती है।
शर्मा ने युवा पीढ़ी का विशेष रूप से आह्वान करते हुए कहा कि वे सत्संग, सेवा और सिमरन को अपने जीवन का अभिन्न अंग बनाएं। उन्होंने कहा कि भौतिक प्रगति के साथ आध्यात्मिक मूल्यों का होना भी आवश्यक है। प्रेम, नम्रता, सहनशीलता और मानवता जैसे गुण ही जीवन को वास्तविक सुंदरता प्रदान करते हैं। उन्होंने युवाओं को प्रेरित किया कि आधुनिक जीवन की व्यस्तताओं के बीच भी वे अपने आध्यात्मिक जीवन के लिए समय अवश्य निकालें।
अपने संबोधन के अंत में शर्मा ने कहा कि संसार में रहते हुए अपने सभी कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन करें, परिवार और समाज के प्रति प्रेम रखें, लेकिन निरंकार को कभी न भूलें। उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि सत्संग में सुने हुए विचारों को अपने आचरण में उतारें और निरंतर सिमरन, सेवा तथा विनम्रता के माध्यम से अपने जीवन को आध्यात्मिक रूप से समृद्ध बनाएं।
इससे पूर्व संत निरंकारी सत्संग भवन, सेक्टर-30 के संयोजक नवनीत पाठक ने समस्त साधसंगत की ओर से इन्द्रजीत शर्मा का चंडीगढ़ पधारने पर स्वागत एवं धन्यवाद व्यक्त किया।
मनुष्य जीवन का मुख्य लक्ष्य परमात्मा की पहचान करके मुक्ति प्राप्त करना है: इन्द्रजीत शर्मा
