वैदिक संस्कृति में गऊ को माता कहते है पशु नहीं: गोपाल मणी

चंडीगढ़, 13 मार्च । वैदिक संस्कृति बहुत विशाल एवं ज्ञान का भंडार है। यही कारण है कि इसमें ऐसी-ऐसी जानकारियां मिलती है जिससे कहीं और पढ़ा या देखा नहीं जा सकते है। अन्य धर्मों में गऊ को पशु कहा जाता है लेकिन वैदिक संस्कृति में इस पशु नहीं बल्कि गऊ माता कहा जाता है। यह कहना है कथावचक गोपाल मणी महाराज जी का।
अखिल भारतीय गऊ क्रांतिमंच एवं श्री गोपाल गोलोक धाम रामेश्वरी भक्ति आश्रम ट्रस्ट के मुख्य संस्थापक संत गोपाल मणी महाराज एक दिन की यात्रा पर उत्तराखंड से श्री गोपाल गोलोग धाम गौशाला कैंबवाला आए हुए है। उन्होंने एक भेंट के दौरान कहा कि आज जो भी वैज्ञानिक खोज कर रहें है वह सभी हमारी सनातम धर्म ग्रंर्थों में विस्तार पूर्वक पहले ही लिखा गया है। जो शायद किसी अन्य धर्म पुस्तकों में विर्णित नहीं है। लाखों हजारों पूर्व हमारे पूर्वजों ने जो ज्ञान हमें सौंप गए है उससे लोग बिते कुछ दसकों में भूला बैठे है। वह मानते है कि लोग गऊ को पशु के रूप में देखने लगे है यही कारण है हिंदू धर्म एवं संस्कृति का विनाश होने लगा है।
गोपाल मणी ने कहा कि हिंदू धर्म में 14 प्रकार के सतकर्म होते है जो गऊ के बिना पूरे हो ही नहीं सकते। इसमें पूजा-पाठ, जप, तप, ज्ञय, दान, तीर्थ, व्रत, तडपन, कथा, किरतन, श्राद, पिंड, योग शामिल है। उन्होंने कहा कि गऊयों को कटने से बचना होग तभी हम सनातम धर्म को बचा पाएंगे। क्योंकि सनातम धर्म में पहले ही उनके महत्व के बारे में विस्तार से बताया गया है। उन्होंने कहा कि देश भर में चर रहे गऊ काटने से रोकने के प्रयासों से ही देश के दो राज्य ने गऊ को राष्ट्रमाता का दर्जा दिया गया है। जिसमें उत्तराखंड एवं हिमाचल शामिल है। हमारा प्रयास है कि इस कानून को पूरे देश में लागू किया जाएं।
गोपाल मणी ने कहा कि गऊ प्रतिष्ठा यज्ञ के रूप में गऊ को कत्लखानों बचाने के लिए संकल्प अभियान चलाया जा रहा है जिसके फलस्वरूप में 7 नवंबर 2021 को दिल्ली में देशभर से गऊ संरक्षण भारी संख्या में पहुंच कर संकल्प दिवस मनाएंगे। इस कार्यक्रम के तहत भारत सरकार से गऊ माता को बचाने के लिए कुछ मांगों को रखी जाएंगी।
इसमें सर्वप्रथम गऊ को राष्ट्रमाता का दर्ज दिया जाएं।
अलग से गऊ मंत्रालय बनाया जाएं।
हर गांव में गऊशालाओं की स्थापना की जाएं और उन गऊशालाओं में सरकरी एवं पक्के तौर पर सेवक-सेविकाओं को नियुक्त किया जाएं।
गोबर का मुल्य किशानों को दिया जाएं।
गोबर से संबंधित बड़े उद्योगिक इकाईयों की स्थापना की जाएं जिससे गोबर गैस प्लांट, खाद, एवं गोबर से बनने वाले उत्पादों को महत्व दिया जाएं।
दस वर्ष तक के बच्चों को गाय का दुध जाएं साथ ही गाय के महत्व आदि का प्रचार प्रसार किया जाएं ताकि सभी उसके महत्व को समझ सकें।

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