श्री प्रताप धर्म प्रचारणी सभा ने किया योगीराज भरत नाटक का मंचन

कपूरथला, 11 अक्टूबर। पीता न कभी दूध तेरा, पीता तो उगल देता, प्रभु से गर्भ मे प्रार्थनाा करता जां तो मुझे बदल देता जां तेरी कोख बदल देता यह उदगार श्री प्रताप धर्म प्रचारिणी सभा रामलीला दशहरा कमेटी की ओर से मंगलवार की सांय को देवी तालाब और रात्रि के समय शालीमार बाग के मंच पर योगी राज भरत नाटक के मंचन के दौरान उस समय कहे जब ननियाल से लौटने पर भरत को पता चलता है कि उसकी माता कैकयी ने पुत्रमोह में आकर महाराज दशरथ से दो बरदान मांग कर एक में उसे अयोध्या का राज और दूसरे में बडे भाई राम को चौदह बर्ष का बनवास मांग लिया और प्रभु राम के बिछोडे में महाराजा दथरथ ने अपने प्राण त्याग दिये। अपने मन की भडास निकालते हुए भरत ने कैकयी को कहा कि है कुलनाशनी माता में तुझ पर धिक्कारता हूं ,तूने उताराधिकारी को बदलवा कर मेरे पिता को मोत के मुहं मे धकेला है ,पर अफसोस कि तूं मेरी माता है और में तेरे प्राण भी नही ले सकता ।
इस दृष्य से पहले महाराजा दशरथ को एहसास होता है कि ऐसा बुरा क्षण और नही होगा कि उसके चारों पुत्र अंत समय में उसके करीब नहीं है,इतना कहते ही अयोध्या नरेश राजा दशरथ को श्रवण कुमार के अंधे माता-पिता के दिए हुए श्राप की बात याद आ जाती है और राजा दशरथ पुत्र वियोग में अपने प्राण त्याग देते है। वहीं राजकुमार भरत,शत्रुघन अपने ननिहाल में गए होते है,वहां पर उन्हें अयोध्या तत्काल पहुंचने का संदेशा प्राप्त होता है। भरत राजमहल में पहुंचते ही पिता जी, पिता जी कहकर ऊंचे स्वर में बोलते है और माता कैकई कहती है कि भरत तुम कुछ समय आराम कर लो,मैं अभी सारी बात बताती हूं,लेकिन पिता से मिलने के लिए उतावले भरत माता कैकई से जिद हठ करते है। अयोध्या नगरी में उदासी भरे माहौल को भांप चुके भरत माता से किसी अनहोनी घटना की जानकारी मांगते है। माता कैकई कहती है कि राजा दशरथ ने प्राण त्याग दिए है,तो बात सुनते ही क्रोधित हुए भरत माता से कहते है कि प्रभुु श्री राम और लक्ष्मण उस वक्त कहां थे। जब कैकई भरत को राम,लक्ष्मण और सीता के बनवास और उसके राज तिलक के वर के बारे में सारा व्रतांत बताती है तो गुस्से से भरे हुए भरत माता कैकई को बुरा भला कह देते है और माता कैकई पश्चाताप करते हुए अन्य रानियों संग भरत के साथ जंगलों में प्रभुु श्री राम को अयोध्या लाने के लिए रवाना हो जाती है। जंगलों में पहुंचकर भरत भईया राम को राजमहल लौटने के लिए आग्रह करते है,लेकिन पिता की मौत की खबर सुनकर प्रभु राम पिता को दिए हुए वचनों को पुरा करने के लिए अडिग हो जाते है,फिर भरत प्रभु राम को संबोधित करते हुए कहते है कि जब तक आप 14 वर्ष का बनवास काटोंगे,तब तक वह भी बनवासी का जीवन व्यतीत करेगा। अंत में प्रभुु राम की प्रतिज्ञा के आगे नतमस्तक हुए भरत भैया राम से उनकी चरण पादुका मांगकर कहते है कि राज सिंहासन पर अपकी पादुका ही अयोध्या का मार्गदर्शन करेगी। अगर आपने बनवास काटने के बाद राजमहल में आने के लिए एक पल भी देरी की तो वह अपने प्राण खो देंगे। उक्त दृश्य देखकर भाव विभोर हुए श्रोतागनों की आंखों में से नीर छलक आए। भरत का शानदार अभिनय अक्षत कालिया और शत्रुघन का किरदार पुलकित सुरी ने निभाया। इस अवसर पर सभा के अध्यक्ष विनोद कालिया,कृष्ण लाल सराफ, कमलजीत सिंह ,बिशंवर दास,रजिंदर वर्मा,सतीश शर्मा,सुरिंदर शर्मा,राजेश सूरी, दबिंदर कालिया,मंगल सिंह, ऐडवोकेट पवन कालिया , गुलशन लुंबा ,अश्वनी सूद ,हरबंत सिंह भंडारी ,देश बेरी , त्रिलोचन सिंह धिंजन, अशोक बवल, जसबिंदर सिंह, भूपिंदर सिंह,बलजिंदर सिंह,बावा पंडित ,किशन दत शर्मा , रघु शर्मा, धर्मपाल तथा दर्जनों कलाकार उपस्थित थे।

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