पंजाब चुनावों में क्या नवजोत सिंह सिद्धू क्रीज से बाहर आकर लगा पाएंगे सिक्सर ?

कपूरथला, 9 जनवरी। पंजाब में राजनीति की खिचड़ी पक रही है। रोज कुछ नए समीकरण बन रहे हैं और कुछ बिगड़ रहे हैं। कुछ पुराने गठबंधन टूटे तो कुछ गठबंधन नया आकार ले रहे हैं। इस सबके बीच नए साल ने भी चुनावी ताल ठोक दी है। चुनावी रण में योद्धा एक-दूसरे पर हमलावर हो रहे हैं और चुनाव की घोषणा से  मैदान में दम भर रहे हैं। 2022 का बाहुबली कौन होगा यह तो मतदाता ही तय करेंगे, लेकिन नए साल से विभिन्न पार्टियों के नेताओं को उम्मीदें बहुत हैं। कोई मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनने की उम्मीद लगाकर बैठा है तो कोई सत्ता वापसी की।
अब देखना यह होगा कि 2022 किसकी उम्मीदों को बल देता है और किसका बल छीन लेता है। चरणजीत सिंह चन्नी पंजाब की राजनीति में इतिहास पुरुष बन गए हैं, क्योंकि वह पंजाब के पहले अनुसूचित जाति वर्ग के मुख्यमंत्री हैं। चन्नी को भले ही कम समय मिला हो, लेकिन उन्होंने यह साबित करने की कोशिश की है कि पार्टी ने अनुसूचित जाति वर्ग के नेता को मुख्यमंत्री बनाकर कोई गलती नहीं की। विपरीत परिस्थितियों व अनुभव की कमी के बावजूद चन्नी ने साबित करने में कसर नहीं छोड़ी कि अपनी छवि को सुधारने और फैसला लेने की क्षमता उनमें है। चन्नी को उम्मीद होगी कि 2022 के चुनाव में उनको लोगों का समर्थन मिलेगा। वह भले ही अपने आप को अगला मुख्यमंत्री न बता रहे हों, लेकिन अगला मुख्यमंत्री वह ही होंगे इसे साबित करने में भी कोई कोर-कसर बाकी नहीं छोड़ रहे हैं।
नया साल या तो सारी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करेगा या फिर एक ऐसा खाली स्थान पैदा करेगा जो शायद ही कभी भर पाए। नवजोत सिंह सिद्धू के लिए 2022 बेहद महत्वपूर्ण है। बतौर प्रदेश अध्यक्ष कांग्रेस उनके नेतृत्व में चुनाव लड़ेगी और यह लड़ाई सिद्धू के पंजाब मॉडल को लेकर है। जिसमें सरकार के राजस्व में वृद्धि और भ्रष्टाचार को खत्म करने पर भी जोर दिया जा रहा है। विपरीत परिस्थितियों के बावजूद सिद्धू ने प्रदेश कांग्रेस की कमान संभाली है। सिद्धू भले ही खुद के पास प्रशासनिक पावर न होने की बात करते हों, लेकिन वह बतौर मुख्यमंत्री प्रशासनिक पावर हासिल करने इच्छा भी रखते हैं। वह जानते हैं कि 2022 में उनकी महत्वाकांक्षा पूरी नहीं हुई तो शायद पांच साल बाद स्थिति इतनी अनुकूल न रहे। नए साल में सिद्धू को उम्मीद होगी कि कांग्रेस उन्हें मुख्यमंत्री पद का चेहरा बनाए।
कैप्टन अमरिंदर सिंह राजनीतिक शतरंज के बेहतरीन खिलाड़ी हैं। कांग्रेस में सम्मान की लड़ाई लड़ते हुए उन्हें मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा। कांग्रेस पर अपमानित करने के आरोप लगाने वाले कैप्टन में अब भी बहुत राजनीति बाकी है और इसे साबित करने के लिए कैप्टन ने पंजाब लोक कांग्रेस पार्टी का गठन किया, जबकि कैप्टन के पास भाजपा में शामिल होने का भी मौका था। कैप्टन ने अपनी करीबी विधायकों को भाजपा में शामिल करवाया, न कि पंजाब लोक कांग्रेस में। यह क्रम जारी है और आगे कहां तक चलेगा इसका जवाब खुद कैप्टन दे सकते हैं या यह नया साल। नए समीकरण में कैप्टन का लक्ष्य 2022 में भारतीय जनता पार्टी के साथ मिलकर न केवल सरकार बनाने का है, बल्कि कांग्रेस को यह सबक सिखाने का भी है कि वह एक ऐसे फौजी हैं जो कि कभी भी पीठ नहीं दिखाते। कैप्टन ने 2022 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए राजनीतिक बिसात पर अपनी चाल चल भी दी है। कैप्टन ने बगैर कोई प्यादा गंवाए कांग्रेस के तीन मोहरे मार गिराए। कैप्टन को नए वर्ष में यही उम्मीद होगी कि वह कांग्रेस को मात देकर विधानसभा चुनाव में चमत्कारी पारी खेलकर पंजाब की राजनीति के इतिहास में अपना नाम स्वर्णिम अक्षरों से दर्ज करवाएं। किसी समय अकाली दल में सुखदेव सिंह ढींडसा का नाम सम्मान के साथ लिया जाता था। 2017 में पार्टी हारी तो ढींडसा ने सुखबीर सिंह बादल के नेतृत्व पर सवाल खड़े किए और अपने पुत्र परमिंदर ढींडसा के साथ शिअद छोड़ खुद की पार्टी बना अपनी राजनीतिक जमीन को सींचने में जुट गए। राजनीतिक भंवरजाल में हिचकोले खाने के बाद अब पिता-पुत्र की आंखों में उम्मीद की किरण दिखाई देने लगी है, क्योंकि उन्होंने भाजपा और कैप्टन के साथ गठबंधन किया है।
अब ढींडसा को यह उम्मीद जरूर होगी कि बेहतर प्रदर्शन के साथ वह दोबारा स्थापित राजनेता की श्रेणी में आ जाएं। भगवंत मान ने कभी सोचा नहीं होगा कि उन्हें राजनीति का वो मुकाम कम समय में मिल जाएगा जिसके लिए कई नेता वषों मेहनत करते हैं। मान 2022 में आप का सीएम पद का चेहरा बनने के प्रबल दावेदार हैं। हालांकि आप मुख्यमंत्री पद के लिए किसी साफ चेहरे की तलाश करने की बात करती है। नए साल में मान को उम्मीद है कि पार्टी जो चेहरा बाहर ढूंढ रही है, वह तलाश उन पर ही खत्म हो। क्योंकि लोकसभा में वह अकेले ही हैं जो आप का झाड़ू उठाकर चल रहे हैं। मान भी जानते हैं कि वह मुख्यमंत्री उम्मीदवार का चेहरा न बने तो फिर दिल्ली दूर हो जाएगी, क्योंकि पंजाब के ताजा राजनीतिक हालात में जो काम अब संभव है वह शायद फिर संभव न हो पाए। पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल 95 वर्ष के हो गए हैं और देश के सबसे वृद्ध राजनेता हैं।
बादल पांच बार पंजाब के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। अब शिरोमणि अकाली दल को उनसे एक बार फिर उम्मीद है कि वह 2022 के विधानसभा चुनाव में मैदान में उतरें। पार्टी चाहती है कि बादल 11वीं बार भी चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचें। लगभग साढ़े चार वर्ष आराम करने के बाद उम्र के इस पड़ाव में भी प्रकाश सिंह बादल पूरी ऊर्जा के साथ दोबारा सक्रिय हो गए हैं। वह अपने गृह क्षेत्र लंबी में लगातार जनसंपर्क कर रहे हैं। बादल अगर 2022 में चुनाव मैदान में उतर विजय हासिल करते हैं तो संभवतया वह देश की राजनीति में नया कीर्तिमान स्थापित करेंगे। शिअद अध्यक्ष सुखबीर बादल के लिए 2022 के विधानसभा चुनाव अति महत्वपूर्ण हैं। उनके नेतृत्व में पार्टी तीसरा विधानसभा चुनाव लड़ने जा रही है। 2017 में पार्टी नशा, बेअदबी, रेत-बजरी और ट्रांसपोर्ट माफिया को संरक्षण देने के मुद्दों में उलझकर राजनीतिक इतिहास में सबसे निचले पायदान पर पहुंच गई थी, जब पार्टी को विधानसभा में विपक्ष का रुतबा भी नहीं मिला, लेकिन पार्टी को इस बार सुखबीर से बहुत उम्मीदें हैं। क्योंकि सुखबीर को चुनाव मैनेजमेंट का अच्छा अनुभव है। परिस्थिति भी 2017 के मुकाबले बेहतर है और पार्टी नए सहयोगी बहुजन समाज पार्टी के साथ चुनाव मैदान में उतरने जा रही है।
सुखबीर को उम्मीद होगी और वह यही लक्ष्य लेकर चल रहे हैं कि पंजाब में खोई हुई सत्ता दोबारा हासिल हो।बलबीर सिंह राजेवाल सम्मानित किसान नेता हैं। कई राजनीतिक दलों से उनके अच्छे संबंध रहे हैं। तीन कृषि सुधार कानूनों के विरोध में राजेवाल के धैर्य व संयम से उनका कद और बढ़ा। किसान संगठनों ने अब चुनाव मैदान में भी हाथ आजमाने का निर्णय लिया और संयुक्त समाज मोर्चा का गठन कर राजेवाल को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बना दिया, लेकिन राजेवाल जानते हैं कि राजनीति की जमीन फिसलन होती है और केवल किसानों के समर्थन के साथ लंबी पारी नहीं खेली जा सकती है। सभी वर्गो का समर्थन चाहिए होगा। राजेवाल को नए साल से उम्मीद होगी कि उन्हें सबका समर्थन मिले और वह नई फसल की बिजाई कर सकें।

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